RTE Act: प्राइवेट स्कूल अब बच्चों को एडमिशन देने से मना नहीं कर सकते, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

RTE Act: प्राइवेट स्कूल अब बच्चों को एडमिशन देने से मना नहीं कर सकते, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

देश में शिक्षा के अधिकार को और मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक बहुत बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि प्राइवेट स्कूल (Private Schools) उन बच्चों को एडमिशन देने से मना नहीं कर सकते, जिन्हें राज्य सरकार ने चुना और अलॉट किया है। यह फैसला उन बच्चों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) और वंचित वर्ग से आते हैं। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यह कदम शिक्षा में समान अवसर (Equal Opportunities) देने के लिए बहुत जरूरी है।

लखनऊ का मामला क्या है?

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक प्राइवेट स्कूल से जुड़ा है। इस स्कूल ने एक गरीब परिवार की बच्ची को एडमिशन (Admission) देने से मना कर दिया था। खास बात यह थी कि उस बच्ची का नाम राज्य सरकार द्वारा जारी की गई लिस्ट में शामिल था। रिपोर्ट के अनुसार, स्कूल ने बच्ची की पात्रता (Eligibility) पर शक जताते हुए उसे दाखिला देने से इनकार कर दिया था।

बच्ची के परिवार ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने स्कूल को आदेश दिया कि वह बच्ची को तुरंत एडमिशन दे। स्कूल ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल की अपील को खारिज कर दिया है।

स्कूलों के पास पात्रता तय करने का अधिकार नहीं

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने स्पष्ट किया कि जब राज्य सरकार किसी बच्चे की जांच करती है और उसे किसी स्कूल के लिए रिकमेंड (Recommend) करती है, तो स्कूल को उसे तुरंत एडमिशन देना होगा। स्कूलों के पास यह अधिकार नहीं है कि वे खुद से बच्चे की पात्रता या एलिजिबिलिटी तय करें। अगर स्कूल को कोई आपत्ति है, तो वह संबंधित सरकारी अधिकारी के पास अपनी बात रख सकता है, लेकिन एडमिशन को रोकना या उसमें देरी करना पूरी तरह गलत है।

RTE एक्ट एक ‘नेशनल मिशन’ है

सुप्रीम कोर्ट ने राइट टू एजुकेशन एक्ट (RTE Act 2009) के तहत गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25% सीटों के आरक्षण को बहुत महत्वपूर्ण बताया है। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ एक कानूनी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि एक ‘नेशनल मिशन’ (National Mission) है। इसका मकसद समाज में समानता और शिक्षा के अधिकार को मजबूत करना है। कोर्ट के मुताबिक, अगर इस कानून को सही से लागू किया जाए, तो यह समाज के ढांचे को बदल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिर से याद दिलाया कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 21A (Article 21A) के तहत 6 से 14 साल के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा (Free and Compulsory Education) का अधिकार है। किसी बच्चे को एडमिशन न देना उसके मौलिक अधिकार (Fundamental Right) का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी कहा कि एडमिशन में देरी करने से बच्चे की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ता है, जो बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।

‘नेबरहुड स्कूल’ (Neighbourhood School) का कॉन्सेप्ट

अदालत ने आरटीई एक्ट में दिए गए ‘नेबरहुड स्कूल’ के कॉन्सेप्ट पर भी जोर दिया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक बैकग्राउंड के बच्चे एक साथ पढ़ें। इससे भेदभाव कम होगा और आपस में समझ बढ़ेगी। कोर्ट ने कहा कि यह समानता और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने की एक सोची-समझी रणनीति है।

स्कूलों और सरकार की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सिर्फ स्कूलों की नहीं है। यह सरकार, स्थानीय प्रशासन, माता-पिता और शिक्षकों की भी बराबर की जिम्मेदारी है। सभी को मिलकर काम करना चाहिए ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।

कोर्ट ने प्राइवेट स्कूलों के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:

  • राज्य सरकार द्वारा भेजे गए बच्चों को तुरंत एडमिशन दिया जाना चाहिए।
  • एडमिशन की प्रक्रिया में कोई देरी नहीं होनी चाहिए।
  • खाली सीटों की जानकारी पहले से ही सार्वजनिक (Public) की जानी चाहिए।
  • किसी भी तरह की मनमानी या बहानेबाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी बच्चे या उसके परिवार को एडमिशन लेने में परेशानी होती है, तो अदालतों को ऐसे मामलों की सुनवाई तुरंत करनी चाहिए। बच्चों से जुड़े मामलों में देरी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह उनके भविष्य का सवाल है।

FAQs

क्या प्राइवेट स्कूल RTE के तहत एडमिशन से मना कर सकते हैं?

नहीं, सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के अनुसार, प्राइवेट स्कूल उन बच्चों को एडमिशन देने से मना नहीं कर सकते जिन्हें सरकार ने अलॉट किया है।

RTE एक्ट के तहत कितनी सीटें आरक्षित होती हैं?

RTE एक्ट 2009 के तहत प्राइवेट स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित होती हैं।

किस उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार है?

संविधान के आर्टिकल 21A के तहत 6 से 14 साल तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है।

अगर स्कूल एडमिशन न दे तो क्या करें?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में अदालतों को तुरंत सुनवाई करनी चाहिए। परिवार कानूनी मदद ले सकते हैं और सरकार को शिकायत कर सकते हैं।

Leave a Comment